Last Updated: October 5, 2013

Navaratri Pooja Vidhi

Navaratri :- Festival for Worship of the Goddess Durga

Goddess Durga
नवरात्रि हिंदुओं का पवित्र पर्व है | नवरात्रि शब्द का तात्पर्य नौ रातों से है | अर्थात नवरात्रि पर्व नौ दिन तक मनाया जाता है |

यह पर्व साल में चार बार आता है| परन्तु वसंत और शरद नवरात्रओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है | नवरात्रि के नौ रातो में तीनों देवियों (दुर्गा अर्थात पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती) के नौ स्वरुपों की पूजा होती है, जो नवदुर्गा के रूप में पूजनीय है |

आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में अलग-अलग पूजा का विधान है| नवरात्रि में नौ दिन तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है |

ये सभी परम पूजनीय दुर्गा के स्वरूप इस प्रकार है :-

प्रथम दिन :- श्री शैलपुत्री माता
द्वितीय दिन :- श्री ब्रह्मचारिणी माता
तृतीय दिन :- श्री चंद्रघंटा माता
चतुर्थ दिन :- श्री कुष्मांडा माता
पंचम दिन :- श्री स्कंदमाता माता
षष्टम दिन :- श्री कात्यायनी माता
सप्तम दिन :- श्री कालरात्री माता
अष्टम दिन :- श्री महागौरी माता
नवम दिन :- श्री सिद्धिदात्री माता की पूजा की जाती है |

नवरात्र का पर्व महत्वपूर्ण रूप से शरद मास में मनाया जाता है, यह पर्व बड़ी श्रृद्धा तथा भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है | माँ दुर्गा का शारदेय नवरात्र प्रतिपदा (एकम) से शुरू होकर नवमी तक मनाया जाता है |

नवरात्र महिमा : -  नवरात्र पूजा का प्रारम्भ त्रेतायुग से माना जाता है | जब लंका पर आक्रमण करने से पहले मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था | माता के आशीवाद और कृपा फलस्वरूप, नवमी के अगले दिन, अर्थात दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की | और इसी के कारण अधर्म पर धर्म कि विजय का प्रतीक दशहरा पर्व मनाया जाने लगा|

शैलपुत्री:- मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप

Devi Shailputri
नवरात्र के प्रथम दिन माता के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है | शैलराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है | यह मां दुर्गा का पहला स्वरूप माना गया है | नंदी नामक वृषभ पर सवार शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है| 

माता शैलपुत्री की पुराणोंनुसार कथा यह आती है कि शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं | जिनका नाम सती था | परन्तु राजा दक्ष को महादेव शिव पसंद नहीं होने के कारण, वे इस शिव-सती विवाह से भी नाखुश थे | 

इसलिए उन्होंने भगवान शिव को अपमानित करने हेतु एक यज्ञ का आयोजन किया तथा अपने यहां आयोजित यज्ञ में उन्होंने महादेव को आमंत्रित नहीं किया | इस सब घटनाक्रम को अपने पति का अपमान मानकर माता सती अपने पिता से इसकी शिकायत करने गई, लेकिन दक्ष ने माता के सामने भी महादेव का अपमान किया | 

तत्पश्चात माता सती पति का अपमान सहन नहीं कर सकीं और यज्ञ की अग्नि में अपने प्राणों कि आहुति दे दी | इस पर महादेव राजा दक्ष पर क्रुद्ध हो गए और उन्होंने वीरभद्र को राजा दक्ष और उसके यज्ञ के विध्वंश हेतु भेजा | तत्पश्चात माता सती का हिमराज के यहाँ पार्वती के रूप पुनर्जन्म हुआ, और  भगवान शिव से उनका पुनर्विवाह हुआ | नवरात्रि के प्रथम दिन, माँ शैलपुत्री की पूजा हेतु साधक को मन से “मूलाधार चक्र” में स्थिर होना चाहिए |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता शैलपुत्री की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌ |
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ||

ब्रह्मचारिणी:- मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप

Devi Brahmcharini
नवरात्र के दूसरे दिन माता के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है | ब्रह्मचारिणी  का शाब्दिक अर्थ:- ब्रह्म अर्थात तपस्या और तप और चारिणी अर्थात  आचरण करने वाली | इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप का आचरण करने वाली होता है |

महादेव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने घोर तपस्या की थी | उन्होंने घर को त्यागकर निर्जन वन में विना आहार का सेवन किये तप किया था, इस कठिन तपस्या के कारण माता को तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी आदि नामों से संबोधित किया जाता है | 

इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं |

मां ब्रह्मचारिणी का पूजन पूर्ण श्रृद्धा से करने पर माता की कृपा से सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है | तथा संकट और आपदों का विनाश होता है |

दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है| माता के इस स्वरूप के पूजन का निष्कर्ष यह है कि जिस प्रकार माता ने वर्षों तक कठिन तप किया और इसके फलस्वरूप भी वें विचलित नहीं हुयी, इसी प्रकार जीवन के कठिन क्षणों में भी मन को विचलित न होने दें |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता ब्रह्मचारिणी की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है:-

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू |
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||

चंद्रघंटा:- मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप

माँ दुर्गा का तृतीय स्वरूप चंद्रघंटा है | नवरात्रि में तीसरे दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है | इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है | नवरात्रि में तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा का विधान है | माता चंद्रघंटा की कृपा से साधक परलौकिक दिव्यता कि अनुभूति होती है |

Devi Chandraghanta
इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है| इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है| इनके शरीर का रंग सोने के समान है| इनके दस हाथ है और सभी हाथ खड्ग और शस्त्रों से विभूषित है | सिंह पर सवार माँ चंद्रघंटा की छवि अनुपम है | देवी चंद्रघंटा के पूजन के दिन साधक का मन “मणिपूर” चक्र में प्रविष्ट होता है|

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता चंद्रघंटा की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता ||

कूष्माण्डा:- मां दुर्गा का चौथा स्वरूप

माँ दुर्गा का चतुर्थ स्वरूप कुष्मांडा है| नवरात्रि में चौथे दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है |

Devi Kushmanda
माता कुष्मांडा के आठ भुजाएं हैं,  इनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र, गदा, जप माला शोभायमान है | माता कुष्मांडा का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़ अत्यंत प्रिय है| संस्कृत में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते है  इसलिए इनका नाम कुष्मांडा है | चतुर्थ दिन में साधक “अदाहत” चक्र में स्थित होता है |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कुष्मांडा रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता कुष्मांडा की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च |
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे ||

स्कंदमाता:- मां दुर्गा का पांचवा स्वरूप

Skandmata
माँ दुर्गा का पंचम स्वरूप स्कंदमाता है | नवरात्रि में पांचवे दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है | स्कंद अर्थात कार्तिकेय,  इनकी माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से जाना जाता है | स्कंदमाता कमल के आसन पर विराजित है, इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है |


स्वरूप:- स्कंदमाता चार भुजाओं से युक्त है, यथा प्रथम दायीं भुजा में स्कंद और द्वित्तीय भुजा में कमल-पुष्प शोभायमान है, तथा प्रथम बायीं भुजा में आशीर्वाद-मुद्रा द्वित्तीय भुजा में पुष्प लिए हुए है, इनका वाहन सिंह है |

स्कंदमाता के पूजन को मोक्षदायी माना जाता तथा इसकी पूजा और आराधना से भक्तों के सभी कष्टों का निवारण होता है |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्कंदमाता रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- स्कंदमाता की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी ||

कात्यायनी :- मां दुर्गा का छठवां स्वरूप

Devi Katyayani
माँ दुर्गा का षष्टम स्वरूप कात्यायनी है | नवरात्रि में छठे दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है |

माता दुर्गा के कात्यायनी होने के पीछे पुराणों में एक कथा आती है, जो इस प्रकार से है – महर्षि कात्यायन जो कि कात्य गोत्र में उत्पन्न हुए थे, उन्होंने भगवती दुर्गा को प्रसन्न करने हेतु घोर तप किया | और माता भगवती प्रसन्न हो वर स्वरुप उनके घर में जन्म लिया | माता जगदम्बा को कात्यायनी भी कहा जाता है |

इनकी पूजा करने वालें भक्तो की सभी मनोकामनाये पूर्ण हो जाती है, और सभी प्रकार के पापों का नाश होता है | पूजा के छठे दिन साधक का मन “आज्ञा” चक्र में स्थित होता है |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता कात्यायनी की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना |
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ||

माता कालरात्री:- माँ दुर्गा का सातवां स्वरूप

Devi Kaalratri
माँ दुर्गा का सप्तम स्वरूप कालरात्री है | नवरात्रि में सातवे दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है | इसे भद्रकाली या महाकाली भी कहा जाता है |

कालरात्री यथा नाम तथा गुण, अर्थात माता कालरात्री की आराधना करने से भूत-प्रेत, ग्रह बाधाओं और आसुरी शक्तियों का नाश होता है | और इनका नाश करने के लिए माता कालरात्रि रूप में काल बनकर आती है | भयंकर रूप होने के बावजूद माँ सदैव शुभ फल दात्री है, इसीलिए इन्हें शुभंकरी भी कहते है | माता कालरात्री से भक्तों को भयभीत नहीं होना चाहिए अपितु उनकी आराधना कर अपने आप को कृतार्थ करना चाहिए |

स्वरूप :- माँ कालरात्री का शरीर घने अंधकार की तरह एकदम काला है | माता के तीन नेत्र है और काल के जैसा भयानक स्वरूप है | सिर के बाल बिखरे हुए है, गले में खोपड़ियों और कंकालों की माला है | हाथ में त्रिशूल और खड्ग लिए हुए माता का स्वरूप अत्यंत भयावह और डरावना है |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्री रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता कालरात्री की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता |
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ||
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा |
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी ||

महागौरी:- मां दुर्गा का आठवां स्वरूप

Devi Mahagouri
माँ दुर्गा का अष्टम स्वरूप महागौरी है | नवरात्रि में आठवें दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है |

महागौरी शब्द से स्पष्ट है कि इनका वर्ण अत्यधिक गौरा है, इसलिए इन्हें महागौरी  भी कहा गया है | पुराणों में इन्हें अष्टवर्षा, अर्थात आठसाल आयु वाली देवी की संज्ञा दी गई है | तथा श्वेत वस्त्र और आभूषण धारण करने के कारण इन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहते है | इनका वाहन होने से ये वृषारूढ़ा भी कहलाती है | माता के इस रूप का दर्शन सुलभ नहीं है, कठिन से कठिन तप से भी इस रूप का दर्शन अप्राप्य माना गया है |

माता महागौरी की आराधना से भक्तों के सारे कष्ट मिट जाते और सभी सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती है |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता महागौरी की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया ||

सिद्धिदात्री:- मां दुर्गा का नवम् स्वरूप

Devi Siddhidatri
माँ दुर्गा का नवम् स्वरूप सिद्धिदात्री है | नवरात्रि में नवम् दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है | पुराणों के अनुसार माता का यह रूप अप्राप्य है |इनके पूजन से सभी सिद्धियों (आठ सिद्धियाँ) की प्राप्ति होती है |
माँ सिद्धिदात्री के चार भुजाये है तथा माता सिंह पर सवार है | नवदुर्गा में यह अंतिम स्वरूप है |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र (बीजमंत्र) :- माता सिद्धिदात्री की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

ॐ एं ह्रीं क्लीं चामुडायै विच्चे ||


अत: नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ दुर्गा के इन नौ रूपों की आराधना करने वाले भक्तों पर माता के विशेष कृपा होती है | साधक को पूर्ण श्रृद्धा और भक्ति से माता के इन रूपों का ध्यान कारण चाहिए |

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