प्रारब्ध क्या है ?
मनुष्य जो भी कुछ कर्म करता है- “चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक” यदि वह शुद्ध मन से किसी आसक्ति के बिना उदासीन भाव से किया गया है तो उसका अन्तकरण पर कोई संस्कार नही पड़ता; क्योकि वह क्रिया रागद्वेषरहित सदारण भाव से कि हुई है, विशेष भाव से नही |